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वैलेंटाइन डे और ढिबरिया

वैलेंटाइन डे और ढिबरिया ढिबरिया भोले बाबा के दर्शन करने मंदिर गया था। लेकिन मंदिर के द्वार के बाहर ही चरणामृत और छिपली में रोली लिए पंडा जी ने उसका रास्ता रोक लिया। उनको देखते ही ढिबरिया का हाथ अनायास अपनी जेब पर चला गया। ढिबरिया ने सोचा, भगवान और भक्त के बीच ये पंडा जी ! कहीं अंगुलीमाल ! पंडा जी बोले, ' अहा जजमान, भगवान का आसीरबाद है... चरणामृत पीओ, सब कष्ट दूर हो जाएगा।' ढिबरिया हंसते हुए बोला, ' सब मेहनत बेकार...जेब ठन ठन गोपाल है।' ' अहा जजमान, सुभ सुभ बोलो...दक्षिणा आज नहीं कल !' ' कल ' ' सालों बाद ऐसा संजोग बना है... बाबा भोले का बियाह और बाबा भेलनटाइन का दिन, एक ही दिन !' ' मने पूरब और पश्चिम, एक साथ। लेकिन समस्या ये है कि अपने भगवान को मानें या उनके ?' ' हम तो कहते हैं, बियाह नहीं तो परेम, कुछ भी कर लो।' ' मने बियाह और परेम, दून्नो दू चीज है ?' ' परेम मक्खन है और बियाह मट्ठा ! मक्खन चाहिए की मट्ठा, सोच लो। लेकिन हम तो कहेंगे परेम ही चुनना। बियाह तो झंझटे-झंझट है।' ' काहे पंडा जी,...